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धूप के नन्हे कण

दीया (Diya)

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Текст

दर्पण के इस महल में
धूप की एक लकीर है
उड़ते हुए ये नन्हे कण
जैसे कोई तस्वीर है
सुनहरी सी ये धूल भी
यादों की एक ज़ंजीर है

हवा में घुली वो महक
चंदन और गुलाब की
धीमे से कोई पुकारता
बातें किसी ख्वाब की

दादी की वो सुकुमार यादें
रेशम सी ये मीठी यादें
विरासत का ये कोमल साज
धड़कता है मेरा आज
उनका ही तो है अंदाज़

सुकुमार स्नेह का एहसास
जैसे वो हों मेरे पास

कोने में टूटी एक चूड़ी
कांच का एक टुकड़ा हरा
पॉटपौर्री की मद्धम खुशबू
बचपन जिससे है भरा
हर चीज़ में है साया उनका
जैसे कोई जादू करा

सन्नाटे में गूँजती
पायल की वो झंकार है
विदाई की इस घड़ी में
बस मीठा सा प्यार है

दादी की वो सुकुमार यादें
रेशम सी ये मीठी यादें
विरासत का ये कोमल साज
धड़कता है मेरा आज
उनका ही तो है अंदाज़

समय की ये महीन बुनावट
हर धागा एक कहानी है
वो चली गईं पर यहीं कहीं
उनकी ही ये निशानी है
हवेली की इन दीवारों में
बहता हुआ कोई पानी है

महीन फिलीग्री सा ये गम
आँखें नहीं हैं मेरी नम

दादी की वो सुकुमार यादें
रेशम सी ये मीठी यादें
विरासत का ये कोमल साज
धड़कता है मेरा आज
उनका ही तो है अंदाज़

सुकुमार स्नेह का एहसास
जैसे वो हों मेरे पास

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