शहर का शोर (Shehar Ka Shor)
आरव (Aarav)87 diputar
टीन की छत पे गिरती बूंदें सुलगती रात की गहरी यादें भीगी हवा की ये सरगोशियाँ पी ली मैंने सारी मदहोशियाँ जेब में फटी एक तस्वीर खिंचती वक्त की ये लकीर धुंधला सा वो एक चेहरा है दर्द ये थोड़ा गहरा है धुएँ में लिपटी ये खामोशी ढूँढती फिरती है मदहोशी दोस्त जो कहते थे साथ रहेंगे अब वो अजनबी बनके बहेंगे कुल्हड़ में चाय ठंडी है किस्मत ये थोड़ी मंदी है कोई गिला नहीं बस दूरी है ज़िंदगी आज भी अधूरी है अधूरी है हाँ ये अधूरी है गली में पीली लाइट जलती साये के पीछे शाम ढलती वादे तो सबने किए थे प्यारे टूट गए वो बनके सितारे वक्त की धूल ने सब मिटाया अपना भी कोई नज़र न आया हारमोनिका की वो धीमी तान जैसे मांग रही हो कोई दान रिश्ते तो बस एक मौसम थे हम ही शायद थोड़े कम थे धोखा नहीं बस ये मोड़ था हाथों से छूटा वो छोर था कुल्हड़ में चाय ठंडी है किस्मत ये थोड़ी मंदी है कोई गिला नहीं बस दूरी है ज़िंदगी आज भी अधूरी है सिगरेट भी अब बुझ चुकी है आग ये अंदर सुलग उठी है तस्वीर के चेहरे धुंधले हैं ज़हन के परदे गंदे हैं मुस्कुरा के इसे रख देता हूँ खामोशी को अब चख लेता हूँ
Memuat…