बचपन का सांवरा
दीया (Diya)32 Wiedergaben
चाँदनी खिड़की पे ठहरी है महक चमेली की गहरी है भीगी पंखुड़ियाँ चुप हैं बीते लम्हे सब धूप हैं हवेली की ये तन्हाई जैसे कोई शहनाई दादी की वो कहानियाँ बचपन की सब निशानियाँ लौट आई हैं आज यहाँ खोया था मेरा जहाँ रेशमी यादों का साया मन ने जिसे है सजाया ना कोई गिला ना शोर स्मृतियों की ये डोर मीठी सी एक टीस है पुरानी ये कशिश है (आ... आ... आ...) (मद्धम सी ये सदा...) पीतल का वो पानदान रखा है बनके वरदान सूखा गुलाब किताब में डूबा किसी ख्वाब में धूल की परतों के नीचे वक़्त हमें पीछे खींचे हवा में एक सरसराहट पुरानी उस आहट की दिल के बंद झरोखों में एक नई सी सजावट की रेशमी यादों का साया मन ने जिसे है सजाया ना कोई गिला ना शोर स्मृतियों की ये डोर मीठी सी एक टीस है पुरानी ये कशिश है दीवारों की नक्काशी जैसे कोई प्यासी झूमर की मद्धम रोशनी भूली हुई कोई रागिनी कांच सी ये ज़िंदगी स्मृतियों की बंदगी खामोशी में बातें हैं ये भीगी सी रातें हैं शिकवा नहीं ज़माने से सुकून है याद आने से खुद से ही मैं कहती हूँ यादों में ही रहती हूँ रेशमी यादों का साया मन ने जिसे है सजाया ना कोई गिला ना शोर स्मृतियों की ये डोर मीठी सी एक टीस है पुरानी ये कशिश है (आ... आ... आ...) (रेशमी सी ये स्मृतियाँ...)
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