चार बजे की धूल
आरव (Aarav)27 Wiedergaben
कोहरे में लिपटी है गंगा की धार डोंगी पे बैठा मैं नदिया के पार अम्मा ने थैले में क्या है छुपाया किशमिश का दाना जो हाथ में आया मीठी सी यादों का जागा है मेला नदिया की लहरों में मैं हूँ अकेला पुरानी वो पोटली और ममता का प्यार बाँध के रखा है जीवन का सार भोर की किरणों ने पानी को छुआ जैसे किसी ने दी दिल से दुआ बहते चलो रे मन के फकीरा मिट जाएगी दिल की ये पीरा (ओ हो रे...) न कोई बंधन, न कोई शिकवा बहता ही जाए ये जीवन का जिकवा बाउल सा मन मेरा उड़ता फिरे आकाश की बाहों में गिरता गिरे दोतारा बोले खड़ताल के संग चढ़ने लगा है ये रूहानी रंग बरगद के नीचे वो मटर की गोटी दुनिया थी बड़ी और फ़िक्र थी छोटी धूल में सने वो बचपन के दिन कटते नहीं अब तो यादों के बिन सूरज का टुकड़ा जो पानी पे तैरे मन के उजालों में सपने हैं गहरे बाढ़ जो आई थी, लौट गई अब मिट्टी में खुशहाली बाँट गया रब खेतों में हरियाली फिर से है छाई गाँव की गलियों में रौनक है आई बहते चलो रे मन के फकीरा मिट जाएगी दिल की ये पीरा (ओ हो रे...) न कोई बंधन, न कोई शिकवा बहता ही जाए ये जीवन का जिकवा बाउल सा मन मेरा उड़ता फिरे आकाश की बाहों में गिरता गिरे परदेसी यार के पाल को निहारूँ नदिया के शोर में उसको पुकारूँ कब उसकी डोंगी ये कोहरा चीरे लौट के आएगा वो भी धीरे-धीरे बाँसुरी की तान में उसका ही नाम ढलने लगा है ये सुनहरा सा शाम मटकी की थाप पे धड़कन चले मिट्टी की खुशबू में साँसें ढले हारमोनियम सुर में कहानी कहे सच्चाई आँखों के पानी में बहे न कोई लालच, न कोई किनारा ये बहता दरिया ही मेरा सहारा अम्मा की पोटली में रब का है वास बुझ गई आज मेरी बरसों की प्यास बहते चलो रे मन के फकीरा मिट जाएगी दिल की ये पीरा (ओ हो रे...) न कोई बंधन, न कोई शिकवा बहता ही जाए ये जीवन का जिकवा बाउल सा मन मेरा उड़ता फिरे आकाश की बाहों में गिरता गिरे दोतारा बोले खड़ताल के संग चढ़ने लगा है ये रूहानी रंग
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