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अनकही कृपा

आरव (Aarav)

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सांझ ढली नदिया के तीर
पीपल की शीतल है छांव
मन में जागी एक पीर
तेरे ही द्वारे आए पांव
धुंधली सी ये शाम है
मुख पे तेरा नाम है

तूने सदा ही संभाला है
हर मुश्किल से निकाला है
बिन बोले सब जान लिया
मुझको अपना मान लिया

तेरी कृपा का अंत नहीं
तुझसा कोई संत नहीं
मैं तो बस इक धूल हूं
तेरे चरणों का फूल हूं
प्रभु मेरे
दाता मेरे
सब तुझको अर्पण है

ओम नमो
नारायणा
ओम नमो
नारायणा

बीते वर्षों की वो यादें
अधूरी सी वो फरियादें
जब मैं अकेला रोया था
धीरज अपना खोया था
तब तूने हाथ बढ़ाया था
चुपके से राह दिखाया था

वो अनकही सी बातें सब
तूने सुनी थी मेरी तब
कोई न था जब पास मेरे
तू ही था विश्वास मेरे

तेरी कृपा का अंत नहीं
तुझसा कोई संत नहीं
मैं तो बस इक धूल हूं
तेरे चरणों का फूल हूं
प्रभु मेरे
दाता मेरे
सब तुझको अर्पण है

दीपक की ये लौ जलती
पवन से पत्तियां सरकती
तुलसी की माला गले सजी
मन में तेरी बीन बजी
नदिया के शीतल छींटे हैं
दुख के कांटे अब छंटे हैं

अब न कोई चाह बाकी है
तू ही मेरी राह बाकी है
संन्यासी सा ये मन मेरा
ढूंढे बस दर्शन तेरा
गर्व नहीं अब हार हूं
मैं तेरा ही विस्तार हूं
तज दिया सब मोह माया
तेरी शरण में सुख पाया

तेरी कृपा का अंत नहीं
तुझसा कोई संत नहीं
मैं तो बस इक धूल हूं
तेरे चरणों का फूल हूं
प्रभु मेरे
दाता मेरे
सब तुझको अर्पण है

ओम नमो
नारायणा
ओम नमो
नारायणा

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