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माटी की माया

आरव (Aarav)

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Текст

गंगा की लहरें पुकारें
दिल को ये यादें दुलारें
मिट्टी की सोंधी सी खुशबू
बचपन के सपने संवारें
गठरी ये यादों की भारी
चल दी है दुनिया ये सारी

वो खेतों की हरियाली
वो धान की वो बाली
वो शाम सुहानी मतवाली
बजती थी जहाँ ताली

जीवन तो बहती धारा
कोई न इसका किनारा
यादों का ही है सहारा
तू है अकेला बंजारा
ओ मन रे
तू है अकेला बंजारा

खमक की ताल पे नाचे
सत्य को मन में ही जाँचे
सुरों के धागे को टाँके
भीतर ही खुद को वो झाँके

चरती वो गौएं और घंटियाँ
खजूरों पे बैठी वो चिड़ियाँ
खुलती हैं यादों की खिड़कियाँ
पुरवा ने छेड़ी है रागिनियाँ
पान के पत्तों की लाली
हंसी वो भोली और भाली

बूँदें गिरीं जब ज़मीं पर
भीगा है मेरा ये अंबर
मंजिल है यादों के भीतर
खोजे जिसे तू उमर भर

जीवन तो बहती धारा
कोई न इसका किनारा
यादों का ही है सहारा
तू है अकेला बंजारा
ओ मन रे
तू है अकेला बंजारा

कच्चा ये माटी का बर्तन
साँसों का होता विसर्जन
लालन के शब्दों में जीवन
कर ले तू खुद से ही दर्शन
न कोई अपना न पराया
सब है ये माटी की माया

साथी वो बचपन का रूठा
वादा वो फसलों का झूठा
सपना वो काँच सा टूटा
मिट्टी का बंधन भी छूटा
फिर भी ये राही अकेला
देखे है यादों का मेला

जीवन तो बहती धारा
कोई न इसका किनारा
यादों का ही है सहारा
तू है अकेला बंजारा
ओ मन रे
तू है अकेला बंजारा

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