bengali folk

सहज बूँद

आरव (Aarav)

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Letra

नदी के तीरे बरखा घिरे
एकतारा बोले धीरे धीरे
मिट्टी की सोंधी महक उड़े
मन मेरा मालिक की ओर मुड़े
भीगा सा ये आंचल मेरा
जैसे साहिब का आँगन घेरा

कुमुद के फूल लहरों पे डोले
हृदय की गांठें चुपके से खोले
सोनापाटी की डाली भी झूमे
बूंदें आकर धरती को चूमे

ये मिलन का राग है
बुझी मन की आग है
जैसे जल में जल मिले
वैसे साहिब संग खिले
सहज है ये डोर
न कोई शोर
बस तू ही तू
चारों ओर

टिंग टिंग एकतारा बाजे
मृदा संग साहिब विराजे
टिंग टिंग एकतारा बाजे
मृदा संग साहिब विराजे

पुराने मठ की घंटी बोले
भीगी हवा में अमृत घोले
दूर कहीं से गूंज ये आए
अस्तित्व की कथा सुनाए
न कोई चाह न कोई दुख
मिट्टी में मिला सच्चा सुख
मेरा अलखल्ला हवा में उड़ता
साहिब की गली में जाकर मुड़ता

कुमुद के फूल लहरों पे डोले
हृदय की गांठें चुपके से खोले
सोनापाटी की डाली भी झूमे
बूंदें आकर धरती को चूमे

ये मिलन का राग है
बुझी मन की आग है
जैसे जल में जल मिले
वैसे साहिब संग खिले
सहज है ये डोर
न कोई शोर
बस तू ही तू
चारों ओर

न मैं नाविक न मैं धारा
मैं तो हूँ बस एक सितारा
बूंद गिरी तो नदी हो गई
हस्ती मेरी कहीं खो गई
स्वीकार है ये शांत किनारा
तू ही मेरा एक सहारा

बाँसुरी की तान सुस्त है
प्रकृति अपने में मस्त है
खमक की थाप धीमी पड़ती
आत्मा साहिब से जा मिलती
अल्हड़ ये मन अब शांत हुआ
भ्रम का सारा अंत हुआ
मिट्टी की गोद में सो जाऊं
तेरी ही बूंद में खो जाऊं

ये मिलन का राग है
बुझी मन की आग है
जैसे जल में जल मिले
वैसे साहिब संग खिले
सहज है ये डोर
न कोई शोर
बस तू ही तू
चारों ओर

टिंग टिंग एकतारा बाजे
मृदा संग साहिब विराजे
टिंग टिंग एकतारा बाजे
मृदा संग साहिब विराजे

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