सरल विनती
दीया (Diya)27 plays
सांझ ढली मंदिर की सीढ़ी धुंधली सी यादों की पीढ़ी पीतल की वह गूंज पुरानी मन कहता अपनी ही कहानी मिट्टी की वह सौंधी खुशबू ढूंढे आज हृदय का जुगनू दादी का वह हाथ पकड़ना भीड़ में भी निडर ही रहना छोटे कदमों की वह आहट भक्ति की वह सरल सजावट आंचल में छुप जाना मेरा देख के वह मंदिर का घेरा ओ मेरे प्रभु डोरी न छूटे सांसों का यह बंधन न टूटे दुनिया की लहरों में मन है अकेला लगा रहे बस तेरा ही मेला मन का दीया बुझने न देना मुझको अपनी शरण में लेना मन का दीया बुझने न देना मुझको अपनी शरण में लेना शहरों के शोर में खोई वाणी भूल गई वह अमृत वाणी रिश्तों की उलझन भारी है अब तो बस तेरी बारी है भीतर एक सन्नाटा गहरा यादों का है सख्त पहरा वही आरती वही है घंटी समय की यह कैसी है पलटी सब कुछ पाकर भी मैं खाली सूनी पड़ी है मन की थाली फिर से वही विश्वास जगा दो सोया हुआ वह भाव जगा दो ओ मेरे प्रभु डोरी न छूटे सांसों का यह बंधन न टूटे दुनिया की लहरों में मन है अकेला लगा रहे बस तेरा ही मेला मन का दीया बुझने न देना मुझको अपनी शरण में लेना रुई की बाती तेल की प्याली लौ है तेरी सबसे निराली सारंगी की धीमी तानें तेरा ही बस नाम बखानें मंजीरे की मीठी झंकार कर दे मेरा बेड़ा पार भटक रही हूँ डगर-डगर मैं ढूंढूं तुझको अपने घर में राधे कृष्णा मन के स्वामी तुम ही हो बस अंतर्यामी राधे कृष्णा प्रीति पुरानी लिख दो अपनी कृपा कहानी धूप की खुशबू चंदन टीका संसार का हर रंग है फीका देहरी पर मैं आन बैठी हूँ आस की डोरी तान बैठी हूँ बचपन वाली वह मुस्कान लौटा दो मेरा खोया ज्ञान ओ मेरे प्रभु डोरी न छूटे सांसों का यह बंधन न टूटे दुनिया की लहरों में मन है अकेला लगा रहे बस तेरा ही मेला मन का दीया बुझने न देना मुझको अपनी शरण में लेना मन का दीया बुझने न देना मुझको अपनी शरण में लेना
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