bengali folk

नदी किनारे (मिट्टी के गीत)

आरव (Aarav)

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Lirik

ढलती शाम का साया है
नदी ने गीत सुनाया है
सूरज डूबा लाली में
तू गया उस पार रे
सूना है संसार रे
मन मेरा अब हारा है

शहर की बातें बड़ी बड़ी
यहाँ तो धूप है कड़ी कड़ी
तूने तो नाता तोड़ दिया
हमें अकेले छोड़ दिया

ओ मेरे यार ओ मेरे मीत
भूल गया क्या मिट्टी के गीत?
कागज की नाव बहती जाए
तेरी यादें हमें रुलाए
लौट के आ जा गाँव की ओर
टूट रही है सांस की डोर

(खमक और दोतारा की धुन)
ओ रे मीत...
ओ रे साथी...
बहता पानी...

किनारे पड़ी है सड़ी सी रस्सी
नाव भी अब तो थकी सी रस्सी
काश के फूल हवा में झूमते
मिट्टी की खुशबू को हैं चूमते
धान के खेतों से आती महक
पर दिल में है एक टीस और दहक

दीयों के अवशेष पानी पर
लिखी है एक अधूरी कहानी पर
वक्त का पहिया चलता जाए
धुंधला सा सूरज ढलता जाए

ओ मेरे यार ओ मेरे मीत
भूल गया क्या मिट्टी के गीत?
कागज की नाव बहती जाए
तेरी यादें हमें रुलाए
लौट के आ जा गाँव की ओर
टूट रही है सांस की डोर

रात के जंगल में लोमड़ी बोले
यादों के बंद किवाड़ ये खोले
चाँद का आना और चाँद का जाना
फकीरी मन का यही है ठिकाना
मिट्टी के तन पर क्या अभिमान
सबका यहाँ एक ही श्मशान

आंखें बिछाई उस राह पर
बैठा हूँ मैं तो इसी चाह पर
शायद कोई नाव फिर आएगी
तुझको किनारे तक लाएगी
थक गया हूँ पर आस है बाकी
खाली पड़ी है यादों की साकी

ओ मेरे यार ओ मेरे मीत
भूल गया क्या मिट्टी के गीत?
कागज की नाव बहती जाए
तेरी यादें हमें रुलाए
लौट के आ जा गाँव की ओर
टूट रही है सांस की डोर

ओ रे मीत...
ओ रे साथी...
बहता पानी...

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