धूप और चिट्ठियाँ
दीया (Diya)20 बजाव
भीगी सड़क, हल्की हवा पुरानी टपरी का वो कोना वही धुआँ, वही नशा यादों का रेशमी खिलौना कॉलेज की वो बेफिक्र हँसी जैसे कोई भूली हुई धुन फँसी धीमी सी एक थिरकन है साँसों में मीठी चुभन है वक्त ठहर गया है वहीं पर जहाँ बिखरी थी अपनी ये दोपहर धीरे से मुस्कुराए वो पल लौट आए चाय की प्याली में धूप घुल जाए कोई मलाल नहीं कोई सवाल नहीं बस ये सुकून रहे हम्म, ये सुकून रहे हल्की सी ये हवा चले किताबों के वो पीले पन्ने ख्वाब जो थे हमने बुने बिना बात के वो ठहाके ज़िंदगी के छोटे से खाके आज भी वो बेंच वहीँ है शायद मेरी रूह भी वहीं है बाँसुरी की एक लहर उठी खामोशी की गिरहें टूटी तबली की थाप पे यादें नाचे जैसे कोई पुराना साज़ बाजे धीरे से मुस्कुराए वो पल लौट आए चाय की प्याली में धूप घुल जाए कोई मलाल नहीं कोई सवाल नहीं बस ये सुकून रहे न कोई बोझ है दिल पर न कोई भागती मंज़िल बस एक ठहरा हुआ लम्हा जैसे साहिल से मिला साहिल सब कुछ वैसा ही तो है ये एहसास कितना नया है धीरे से मुस्कुराए वो पल लौट आए चाय की प्याली में धूप घुल जाए कोई मलाल नहीं कोई सवाल नहीं बस ये सुकून रहे हम्म, ये सुकून रहे हल्की सी ये हवा चले यादों की महक मिले
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