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साँझ का किनारा

दीया (Diya)

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गीत

पहाड़ की चोटी पर खड़ी
वो याद जो थी बड़ी
धुंध में लिपटी पगडंडी
रुक गई आज मेरी घड़ी
सालों बाद यहाँ आई हूँ
अपनी ही परछाई लाई हूँ

हवा में घुली वही महक
चिड़ियों की वही चहक
मैं बदल गई हूँ रास्तों में
पर वही है ये दहक
हाँ वही है ये दहक

जंगल ने मुझे पुकारा है
ये मेरा ही सहारा है
बिना सवाल गले लगाया
जैसे मैं ही इसका तारा हूँ
ठहर गई हूँ अब यहाँ
छोड़ आई सारा जहाँ

ओ... ठहर गई
मैं सँवर गई
इन पेड़ों की छाँव में
मैं बिखर गई

दूर कहीं बजती घंटियाँ
सूखी हुई ये पत्तियाँ
नदी का संगीत धीमा है
टूटी सब मन की कश्तियाँ
सब कुछ वैसा ही खड़ा है
वक़्त ये कितना बड़ा है

क्षितिज पे डूबता वो सूरज
जैसे कोई पुराना सा नूरज
मैं अकेली हूँ पर तन्हा नहीं
मिल गया जीने का सूरज
हाँ मिल गया ये सूरज

जंगल ने मुझे पुकारा है
ये मेरा ही सहारा है
बिना सवाल गले लगाया
जैसे मैं ही इसका तारा हूँ
ठहर गई हूँ अब यहाँ
छोड़ आई सारा जहाँ

तानपुरा गूँजता है मन में
जैसे बारिश हो इस तन में
भीगी मिट्टी की वो सोंधी खुशबू
खो गई हूँ मैं इस वन में
कोई शिकवा अब नहीं रहा
जो भी था सब बह गया
सब कुछ अब सही है
शांति यहीं तो रही है

सुनो ये सन्नाटा
ये रूह का नाता
जंगल की ये गोदी
जैसे माँ का खाता

जंगल ने मुझे पुकारा है
ये मेरा ही सहारा है
बिना सवाल गले लगाया
जैसे मैं ही इसका तारा हूँ
ठहर गई हूँ अब यहाँ
छोड़ आई सारा जहाँ

ओ... ठहर गई
मैं सँवर गई
इन पेड़ों की छाँव में
मैं बिखर गई

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