कोमल खलबल
दीया (Diya)48 reproducciones
शिखर पर बैठी अकेली रात की ये अनकही पहेली तारा एक गिरा है टूटकर सपना कोई गया है छूटकर नीली हवा का ये स्पर्श मिट गया है मन का हर्ष सब सौंप दिया इस शून्य को सब घोल दिया इस मौन में जो मिला नहीं, वो मेरा था एक धुंधला सा सवेरा था अधूरे ख्वाबों की वो माला आकाश ने अब है संभाला कोई बोझ नहीं अब कंधों पर उड़ रही हूँ मैं पंखों पर बह जाने दो (बह जाने दो) मिट जाने दो (मिट जाने दो) आकाश की इन बाहों में मुझे सो जाने दो न शोर है, न प्यास है बस एक गहरा अहसास है शून्य में सब विलीन है मन मेरा अब तल्लीन है मैं ही मिट्टी, मैं ही हवा मैं ही दर्द, मैं ही दवा झील की लहरों में मैं हूँ पहाड़ के सन्नाटे में मैं हूँ ब्रह्मांड ये मुझमें बहता मौन ही अब सब कुछ कहता पुराने पन्ने जल चुके हैं रास्ते सब ढल चुके हैं शिकवा नहीं कोई तकदीर से आज़ाद हूँ हर ज़ंजीर से तारों की राख बन जाऊं इस अनंत में समा जाऊं बह जाने दो (बह जाने दो) मिट जाने दो (मिट जाने दो) आकाश की इन बाहों में मुझे सो जाने दो न शोर है, न प्यास है बस एक गहरा अहसास है ओम शांति, ओम अनंत शुरुआत में ही छिपा अंत ओम शांति, ओम अनंत
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